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Jhangora (झंगोरा)

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Echinochloa frumentacea (झंगोरा) is a species of Echinochloa. This millet is widely grown as a cereal in India, Pakistan, and Nepal. Its wild ancestor is the tropical grass Echinochloa colona, but the exact date or region of domestication is uncertain. It is cultivated on marginal lands where rice and other crops will not grow well. The grains are cooked in water, like rice, or boiled with milk and sugar. Sometimes it is fermented to make beer. While also being part of staple diet for some communities in India. उत्तराखण्ड में झंगोरा की खेती बहुतायत मात्रा में असिंचित भू-भाग में की जाती है। यह पोएसी परिवार का पौंधा है। उत्तराखण्ड में झंगोरा को अनाज तथा पशुचारे दोनों के लिये उपयोग किया जाता है। झंगोरा की महत्ता इसी बात से लगाई जा सकती है कि इसको बिलियन डालर ग्रास का नाम भी दिया गया है। विश्वभर में झंगोरा की 32 प्रजातियां पाई जाती है| आज विश्व में ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशो में अनाज आधारित उत्पाद बहुतायात मात्रा में बनाया जाता है। Foxtail Millet अन्य अनाज की अपेक्षा ज्यादा पोष्टिक, Gluten free तथा Slow digestible गुणों के कारण अन्य अनाजों के बजाय Millet का प्रयोग बहुतायत किया जा सकता है जो कि Foxtail Millet उत्पादकों के लिये बाजार तथा उत्पादो के लिये Gluten free food का बाजार बन सकता है। उत्तराखण्ड में ही नहीं भारत में भी खेती योग्य भूमि का अधिकतम भू-भाग असिंचित होने के कारण पौष्टिकता से भरपूर Millet उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है जो कि आर्थिकी का एक बडा विकल्प होगा। आइये जानते है झंगोरा खाने के फायदे:-
  • Foxtail Millet का सर्वाधिक उपयोग विश्व में केवल Alcohol निर्माण के लिये Poultry feed में ही किया जाता है।
  • झंगोरे में काबोहाइड्रेट के अलावा प्रोटीन -6.2 ग्राम, वसा-2.2 ग्राम, फाईवर-9.8 ग्राम, कैल्शियम -20 ग्राम, फास्फोरस 280 मि०ग्राम, आयरन- 5.0 मि0ग्राम, मैग्नीशियम- 82 मि0ग्राम, जिंक 3 मि0ग्राम पाया जाता है। झंगोरे में प्रोटीन 12 प्रतिशत जो कि 81.13 प्रतिशत 58.56% है तथा कार्बोहाइड्रेट 58.56% जो 25.88% Slow digestible होता है।

साभार: डा0 राजेन्द्र डोभाल

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Koda (कोदा)

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Eleusine indica, the Indian goosegrass,[1] yard-grass,[2] goosegrass, wiregrass, or crowfootgrass, is a species of grass in the family Poaceae. It is a small annual grass distributed throughout the warmer areas of the world to about 50 degrees latitude. It is an invasive species in some areas. अगर आप उत्तराखंड के हैं और आपने कोदे की रोटी नहीं खाई तो आपने एक अच्छी चीज मिस कर दी है। कोदा यानि मडुवे की रोटी सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि स्वास्थयवर्धक भी है, लेकिन इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये कि कोदा उत्तराखंड के किसानों की आर्थिकी का भी एक बेहतर स्रोत बन सकता है। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में उगाया जाने वाला मडुवा पौष्टिकता का खजाना है। अनाजों में राजा माना जाने वाला मंडुवा आज से ही नहीं ऋषि मुनियों के काल से ही अपने महत्वपूर्ण गुणों के लिए जाना जाता है। भारत वर्ष में मंडुवे का इतिहास 3000 ई0पूर्व से है। पाश्चात्य की भेंट चढनें वाले इस अनाज को सिर्फ अनाज ही नही अनाज औषधि भी कहा जा सकता है। इन्ही अनाज औषधीय गुणों के कारणः वापस आधुनिक युग में इसे पुनः राष्ट्रीय एंव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान मिलने लगा है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय journals तथा मैग्जीन्स इसे आज पावर हाउस नाम से भी वैज्ञानिक तथा शोध जगत में स्थान दे रहे है। इसका वैज्ञानिक नाम इल्यूसीन कोराकाना जो कि पोएसी कुल का पौधा है। इसे देश दुनिया में विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे कि अंग्रजी में प्रसिद्व नाम फिंगर मिलेट, कोदा, मंडुवा, रागी, मारवा, मंडल नाचनी, मांडिया, नागली आदि। भारत मे मडुवें की मुख्य रुप से 2 प्रजातियां पायी जाती है जिसे Eleusine indica जंगली तथा Eleusine coracana प्रमुख रुप से उगाई जाती है, जो कि सामान्यतः 2,300 मीटर (समुद्र तल से) की ऊंचाई तक उगाया जाता है। मंडवें की खेती बहुत ही आसानी से कम लागत, बिना किसी भारीभरकम तकनीकी के ही सामान्य जलवायु तथा मिटटी में आसानी से उग जाती है। मडुवा C4 कैटेगरी का पौधा होने के कारण इसमें बहुत ही आसानी से प्रकाश संश्लेषण हो जाता है तथा दिनरात प्रकाष संश्लेषण कर सकता है। जिसके कारण इसमे चार कार्बन कमपाउड बनने की वजह से ही मंडुवे का पौधा किसी भी विषम परिस्थिति में उत्पादन देने की क्षमता रखता है और ईसी गुण के कारण इसे Climate Smart Crop का भी नाम भी दिया गया है। कई वैज्ञानिक अध्ययनो के अनुसार यह माना गया है की मडुवा में गहरी जडों की वजह से सुखा सहने करने की क्षमता तथा विपरीत वातावरण जहां वर्षा 300mm से भी कम पाई जाती है। वस्तुतः सभी Millets में Seed coat, embryo तथा Endosperm आटे के मुख्य अवयव होते है। जहां तक मडुवा का वैज्ञानिक विश्लेषण है कि मडुवे के Multilayered seed coat (5 layers) पाया जाता है जो इसे अन्य Millet से Dietary Fiber की तुलना में सर्वश्रेश्ठ बनाता है। FAO के 1995 के अध्ययन के अनुसार मंडुवे में Starch Granules का आकार भी बडा (3से 21µm) पाया जाता है जो इसे Enzymatic digestion के लिए बेहतर बनाता है। यद्यपि मंडुवे की उत्पति इथूपिया हॉलैंड से माना जाता है लेकिन भारत विश्व का सबसे ज्यादा मडुवा उत्पादक देश है, जो विश्व मे 40 प्रतिशत का योगदान रखता है तथा विश्व का 25प्रतिशत सर्वाधिक क्षेत्रफल भारत में पाया जाता है। भारत के अलावा मंडवे की खेती प्रतिशतमे अफ्रीका से जापान और ऑस्ट्रेलिया तक की जाती है। दुनिया में लगभग 2.5 मिलियन टन मंडुवे का उत्पादन किया जाता है। भारत में मुख्य फसलों मे शामिल मंडुवे की खेती लगभग 2.0 मिलियन हेक्टेयर पर की जाती है जिसमे औसतन 2.15 मिलियन टन मंडुवे का उत्पादन होता है जो कि दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग 40 से 50 प्रतिशत है। पोषक तत्वों से भरपूर मंडुवे मे औसतन 329 किलो0 कैलोरी, 7.3 ग्राम प्रोटीन, 1.3 ग्राम फैट, 72.0 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 3.6 ग्राम फाइबर, 104 मि0ग्राम आयोडीन, 42 माइक्रो ग्राम कुल कैरोटीन पाया जाता है। इसके अलावा यह प्राकृतिक मिनरल का भी अच्छा स्रोत है। इसमें कैल्शियम 344Mg तथा फासफोरस 283 Mg प्रति 100 ग्राम में पाया जाता है। मंडंवे में Ca की मात्रा चावल और मक्की की अपेक्षा 40 गुना तथा गेहु के अपेक्षा 10 गुना ज्यादा है। जिसकी वजह से यह हडिडयों को मजबूत करने में उपयोगी है। प्रोटीन , एमिनो एसिड, कार्बोहाइड्रेट तथा फीनोलिक्स की अच्छी मात्रा होने के कारण इसका उपयोग वजन करने से पाचन शक्ति बढाने में तथा एंटी एजिंग में भी किया जाता है। मंडुवे का कम ग्लाइसिमिक इंडेक्स तथा ग्लूटोन के कारण टाइप-2 डायविटीज में भी अच्छा उपयोग माना जाता है जिससे कि यह रक्त में शुगर की मात्रा नही बढने देता है। अत्यधिक न्यूट्रेटिव गुण होने के कारण मंडवे की डिंमाड विश्वस्तर पर लगातार बढती जा रही है जैसे कि आज यू0एस0ए0, कनाडा, यू0के०, नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया, ओमान] कुवैत तथा जापान में इसकी बहुत डिमांड है। भारत के कुल निर्यात वर्ष 2004-2005 के आकडों के अनुसार 58 प्रतिशत उत्पादन सिर्फ कर्नाटक में होता है। कर्नाटक मे लगभग 1,733 हजार टन जबकि उत्तराखण्ड में 190 हजार टन उत्पादन हुआ था जबकि 2008-2009 में भारत के कुल 1477 किलोग्राम हैक्टेयर औसत उत्पादन रहा। अनाज के साथ-साथ मडवे को पशुओ के चारे के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता हैं जो कि लगभग 3 से 9 टन/हैक्टेयर की दर से मिल जाता है। वर्ष 2004 में मंडुवे के बिस्किट बनाने तथा विधि को पेटेंट कराया गया था तथा 2011 में मंडुवे के रेडीमेड फूड प्रोडक्टस बनाने कि लिए पेटेन्ट किया गया था। दुनिया भर में मंडुवे का उपयोग मुख्य रूप से न्यूट्रेटिव डाइट प्रोडक्ट्स के लिए किया जाता है। एशिया तथा अफ़्रीकी देशो में मंडुवे को मुख्य भोजन के रूप में खूब इस्तेमाल किया जाता है जबकि अन्य विकिसत देशो में भी इसकी मुख्य न्यूट्रेटिभ गुणों के कारण अच्छी डिमांड है और खूब सारे फूड प्रोडक्टस जैसें कि न्यूडलस, बिस्किट्स, ब्रेड, पास्ता आदि मे मुख्य अवयव के रूप मे उपयोग किया जाता है। जापान द्वारा उत्तराखण्ड से अच्छी मात्रा में मंडवे का आयात किया जाता है। इण्डिया मार्ट में मडुवा 30 से 40 रू0 प्रति कि0ग्राम की दर से बिक रहा है। 26 अगस्त 2013 के द टाइम्स ऑफ इण्डिया के अनुसार इण्डिया की सबसे सस्ती फसल (मडुवा) इसके न्यूट्रिशनल गुणों के कारण अमेरिका में सबसे महंगी है। मंडुवा अमेरिका मे भारत से 500 गुना मंहगा बिकता है। यू0एस0ए0 मे इसकी कीमत लगभग 10US डॉलर प्रति किलोग्राम है जो कि यहां 630 रू0 के बराबर है। जैविक मडुवे का आटा बाजार में 150 किलोग्राम तक बेचा जाता है। भारत से कई देशो -अमेरीका, कनाडा , नार्वे, ऑस्ट्रेलिया, कुवैत, ओमान को मंडुवा निर्यात किया गया। केन्या में भी बाजरा तथा मक्का की अपेक्षा मंडुवे की कीमत लगभग दुगुनी है जबकि यूगाण्डा में कुल फसल उत्पादित क्षेत्रफल के आधें में केवल मंडुवे का ही उत्पादन किया जाता है। जबकि भारत में इसका महत्व निर्यात की बढती मांग को देखते हुए विगत 50 वर्षो से 50 प्रतिशत उत्पादन मे बढोतरी हुयी है जबकि नेपाल में मंडुवा उत्पादित क्षेत्रफल 8 प्रतिषत प्रतिशत की दर से बढ रहा है। चूँकि उत्तराखण्ड प्रदेश का अधिकतम खेती योग्य भूमी असिंचित है तथा मडुवा असिंचित देशो मे उगाये जाने के लिये एक उपयुक्त फसल है जिसका राष्ट्रीय एवम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पोष्टिक उत्पाद बनाने मे प्रयोग किया जाता है। मंडुवा प्रदेश की आर्थिकी का बेहतर स्रोत बन सकता है। डॉ राजेंद्र डोभाल
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Red Rice (लाल चावल)

वैसे तो देहरादून की वासमती चावल देश – विदेश में प्रसिद्ध है लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ों में उगाए जाने वाले लाल चावलों के बारे में कम ही लोग जानते हैं। यहां पढिए उत्तराखंड के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् के महानिदेशक डा0 राजेन्द्र डोभाल का ये लेख…। उत्तराखण्ड का बहुमूल्य उत्पाद : लाल चावल (Red Rice) सामान्यतः चावल तो विश्व प्रसिद्ध है ही तथा सम्पूर्ण विश्व में चावल की बहुत सारी प्रजातियां को व्यवसायिक रूप से उगाया जाता है। जहां तक चावल उत्पादन में भारत की बात की जाय तो लगभग एक तिहाई जनसंख्या चावल के व्यवसायिक उत्पादन अन्तर्गत है, परन्तु हिमालयी राज्यों तथा बिहार, झारखण्ड, तमिलनाडु तथा केरल में कुछ पारम्परिक प्राचीन चावल की प्रजातियां आज भी मौजूद है, जिनको स्थानीय लोग आज भी उगाते हैं व उपयोग करते हैं। इन्ही में से एक बहुमूल्य प्रजाति लाल चावल है, जिसकी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में बृहद मांग रहती है। जहां तक रंगीन (Pigmented) चावल की बात की जाय तो भारत के विभिन्न राज्यों में विभिन्न रंग के चावल जैसे कि हरा, बैंगनी, भूरा तथा लाल चावल आदि उत्पादन किया जाता है साथ ही उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में लाल चावल का उत्पादन किया जाता है। उत्तराखण्ड के पुरोला में लाल चावल की पारम्परिक खेती की जाती है जिसको स्थानीय बाजार तथा कई देशो में खूब मांग रहती है। विश्व में दक्षिणी एशिया में Pigmented चावल पारम्परिक रूप से उगाया जाता है। तमिलनाडू तथा केरल में लाल चावल को उमा के नाम से जाना जाता है। कुछ वर्ष पूर्व संयुक्त राज्य अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय चावल वर्ष मनाया गया। वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में करोड़ो लोग जीवनयापन तथा मुख्य खाद्य शैली मे चावल का उपयोग करते है। विश्व में अनाज उत्पादन तथा गरीबी व भुखमरी मिटाने में चावल का मुख्य योगदान रहा है। आज विश्वभर में चावल की असंख्य High yielding Varieties (HYV) मौजूद है जिसमें सफेद (Polished) चावल मुख्यतः विश्वभर में खाने में प्रयुक्त होता है, जबकि कई वैज्ञानिक अध्ययनो में यह बताया गया है की Polished चावल पौष्टिकता की दृष्टि से लाल चावल की अपेक्षा कम लाभदायक है क्योंकि कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व Polishing प्रक्रिया के दौरान नष्ट हो जाते है। चावल से protecting Pericarp के नष्ट होने से लगभग 29 प्रतिशत प्रोटीन, 79 प्रतिशत वसा तथा 67 प्रतिशत लौह तथा 67 प्रतिशत विटामिन B3, 80 प्रतिशत विटामिन B1, 90 प्रतिशत विटामिन B6 तथा All Dietary fiber भी नष्ट हो जाते है जबकि लाल चावल में Pigmented protecting Pericarp के मौजूद होने से सभी विटामिन्स, मिनरल्स तथा पोषक तत्व पूर्णत विद्यमान रहते हैं। लाल चावल में सबसे महत्वपूर्ण Rice bran ही है जो पोष्टिक एवं औषधीय गुणों से भरपूर होता है। जहां तक लाल चावल तथा सफेद (Polished) चावल को पौष्टिकता की दृष्टि से तुलनात्मक विष्लेशण किया जाय तो सफेद चावल में प्रोटीन 6.8ग्राम0/100ग्राम0, लौह 1.2 मिग्रा0/100 ग्राम, जिंक 0.5 मिग्रा0/100ग्राम, फाईवर 0.6 ग्राम/100 ग्राम, जबकि लाल चावल में प्रोटीन 7.0 ग्राम/100 ग्राम फाईवर 2.0 ग्राम/100 ग्राम, लौह 5.5 मिग्रा0/100 ग्राम तथा जिंक 3.3 मिग्रा0/100 ग्राम तक पाये जाते है। प्राचीन ग्रन्थ चरक संहिता में भी लाल चावल का उल्लेख पाया जाता है जिसमें लाल चावल को रोग प्रतिरोधक के साथ-साथ पोष्टिक बताया गया है। पोष्टिक तथा औषधीय गुणों से भरपूर होने के साथ-साथ लाल चावल में विपरीत वातावरण में भी उत्पादन देने कि क्षमता होती है। यह कमजोर मिटटी, कम या ज्यादा पानी तथा पहाड़ी ढालूदार आसिंचित खेतो में भी उत्पादित किया जा सकता है। लाल चावल में मौजूद गुणों के कारण ही वर्तमान में भी उच्च गुणवत्ता युक्त प्रजातियां के विकास के लिए Breeding तथा Genetic improvement के लिए लाल चावल का प्रयोग किया जाता है। विश्वभर में हुए कुछ ही अध्ययनों में लाल चावल का वैज्ञानिक विष्लेशण होने के प्रमाण मिले है जबकि लाल चावल antioxidant, Arteriosclerosis-Preventive तथा Anticancer के निवारण के लिए अच्छी क्षमता रखता है। सर्वप्रथम सबसे प्राचीन लाल चावल जापान में लगभग 300 BC YAYOI काल में एक प्रमुख जापानी डिश, जो विशेष अवसरों पर बनाई जाती थी, में होने के प्रमाण मिले है। जापानी सरकार द्वारा वर्ष 2007 में Oryza oil and Fat Chemical Co. Ltd. के सौजन्य से सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों के सहयोग हेतु प्राचीन लाल चावल का (Red Rice) एक परियोजना “application of Pigmental Compounds ancient rice in prevention and remedy of metabolic syndromes” में विस्तृत अध्ययन किया गया। उपरोक्त अध्ययन के दौरान लाल चावल में मौजूद polyphenol तथा procyanidine का anti dyslipidemic गुण पाये जाते है और इसी वजह से लाल चावल metabolic syndrome तथा विभिन्न स्वास्थ्य उत्पादों के लिए प्रयुक्त होता है जो कि Dyslipidemia तथा Hyperglycemia में लाभदायक पाये जाते है। लाल चावल metabolic syndrome जैसे पेट में वसा का जमाव, Hypertension, Hyperglycemia तथा hyper triglyceridemia में बेहतर पाये जाता है। लाल चावल के प्रयोग से यकृत तथा खून में triglyceride कि मात्रा काफी निम्न स्तर पर पाई गई है। लाल चावल कि antoxidative प्रभाव 170µg/मिग्रा0 तथा 64µg/मिग्रा0 पाये गये है। उत्तराखण्ड के अलावा छत्तीसगढ तथा झारखण्ड में भी लाल चावल का प्रयोग किया जाता है। जिसको स्थानीय भाषा में भामा के नाम से जाना जाता है। इन्ही राज्यों मे एक सामाजिक अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि लाल चावल का पानी (Starchy water- mar) भी काफी लाभदायक होता है। इसके उपयोग से पूरे दिनभर ताजगी के साथ-साथ ऊर्जावान भी महसूस करते है तथा लम्बे समय तक कार्य करने के बावजूद भी प्यास नहीं लगती है। लाल चावल अन्य पोष्टिक गुणों को साथ-साथ Type-2 मधुमेह sensitivity के लिये भी लाभदायक पाया जाता है। लाल चावल में जो रंगीन तत्व (Pigment) Anthocyanin पाया जाता है वह फल और सब्जियों में भी पाया जाता है। वह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने के साथ-साथ Inflammation को भी कम करता है। आज भी देश के कई राज्यों जैसे हिमाचल में रक्तचाप तथा बुखार के निवारण के लाल चावल का प्रयोग किया जाता है तथा तमिलनाडु में महिलायें दूध बढाने के लिए लाल चावल लाभदायक मानती है। उत्तर प्रदेश में ल्यूकोरिया व Abortion Complications, जबकि कर्नाटक में टॉनिक के रूप में प्रयोग किया जाता है। आज विश्वभर में सफेद (Polished) चावल की धूम मची हुई है जबकि स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण लाल चावल को इतना महत्व नहीं मिला है। वर्तमान में भी भारत में स्थानीय बाजार में लाल चावल 50 रूपये/किग्रा0 तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में जैविक लाल चावल 250/किग्रा0 तक बेचा जाता है। यदि उत्तराखण्ड के सिंचित तथा असिंचित दशा में मोटे धान की जगह पर यदि लाल चावल को व्यवसायिक रूप से उत्पादित किया जाय तो यह राज्य में बेहतर अर्थिकी का स्रोत बन सकता है।
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कौंणी (foxtail millet)

Foxtail millet is rich in dietary fiber, protein and low in fat. foxtail millet releases glucose steadily without affecting the metabolism of the body. The incidence of diabetes is rare among the population which consumes foxtail millet diet. Millets are highly nutritious and non-glutinous.They are considered to be the least allergenic and most easily digestible grains available. Since millet does not contain gluten, it is a wonderful grain alternative for people who are gluten-sensitive It helps control Blood sugar levels when consumed on regular basis. It showed lowered triglyceride levels, LDL/VLDL Cholesterol and increase in HDL Cholesterol. Millet's are a natural source of protein and iron. Millet is very easy to digest; it contains a high amount of lecithin and is excellent for strengthening the nervous system. Millet's are rich in B vitamins, especially niacin, B6 and folic acid, as well as the minerals calcium, iron, potassium, magnesium and zinc. कौंणी एक under utilized फसल जिसको foxtail millet के नाम से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम setaria italica है तथा posceae परिवार का पौधा है। कौंणी एक प्राचीन फसल है, इसका उत्पादन चीन, भारत, रूस, अफ्रीका तथा अमेरिका में किया जाता है। कौंणी चीन में लगभग 5000 वर्ष पूर्व तथा यूरोप में लगभग 3000 वर्ष पूर्व से चलन में है। कौंणी का चावल एशिया, दक्षिणी पूर्वी यूरोप तथा अफ्रीका में खाया जाता है। विश्वभर में कौंणी की लगभग 100 प्रजातियां पाई जाती हैं। कौंणी की लगभग सभी प्रजातियां अनाज उत्पादन के लिये उगाई जाती हैं केवल setari sphacelata पशुचारे के लिये उगाई जाती हैं। वैसे तो उत्तराखण्ड में कौंणी की खेती वृहद मात्रा में नहीं की जाती है, केवल कौंणी के कुछ बीजों को मडुवें के साथ मिश्रित फसल के रूप में बहारनाजा पद्धति के तहत उगाया जाता है। पुराने समय में कौंणी के अनाज को पशुओ के लिये पोष्टिक आहार तैयार करने के लिये उगाया जाता था परन्तु वर्तमान में एक खेत में केवल कौंणी के 8-10 पौधे ही दिखाई देते हैं जो कि बीजों को बचाने के लिये (Germplasm saving) के लिये हैं। दक्षिणी भारत तथा छत्तीसगढ़ के जन जातीय क्षेत्रों में कौंणी प्रमुख रूप से उगाया तथा खाया जाता है। छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में कौंणी का उपयोग औषधि के रूप में अतिसार, हड्डियों की कमजोरी एवं सूजन आदि के उपचार के लिये भी किया जाता है। प्राचीन समय से ही कौंणी को कई क्षेत्रो में खेतों की मेड पर भी उगाया जाता है क्योंकि कौंणी में मिट्टी को बांधने की अदभुत क्षमता होती है तथा इसी वजह से FAO 2011 में कौंणी को “Forest reclamation approach” के लिये संस्तुत किया गया था। जहां तक कौंणी की पोष्टिक गुणवत्ता की बात की जाय तो यह अन्य millets की तरह ही पोष्टिक तथा मिनरल्स से भरपूर होने के साथ-साथ वीटा कैरोटीन का भी प्रमुख स्रोत है। कौंणी में Alkaloids, phenolics, flavonoids तथा tannins के अलावा starch 57.57 mg/gm, carbohydrates 67.68 mg/gm, protein 13.81%, fat 4.0%, fiber 35.2%, calcium 3.0 Mg/gm, phosphorus 3.0 mg/gm, iron 2.8 mg/gm पाया जाता है। इन सब पोष्टिक गुणवत्ता के साथ-साथ कौंणी का अनाज low glycimic भी होता है। यदि गेहूं के आटे से कौंणी की तुलना की जाय तो कौंणी की GI value 50.8 पाई जाती है जबकि गेंहू में 68 तक पाई जाती है। कौंणी में 55% प्राकृतिक insoluble fiber पाया जाता है जो कि अन्य millet की तुलना में काफी अधिक है। यह माना जाता है कि कौंणी को खाने से काफी सारी chronic बीमारियों का निवारण हो जाता है। कौंणी के साथ-साथ अन्य millets की पौष्टिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तंजानिया में एड्स रोगियों के बेहतर स्वास्थ्य तथा औषधियों के कारगर प्रभाव के लिये millet से निर्मित भोजन दिया जाता है। श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार कौंणी खून में ग्लूकोज की मात्रा 70 प्रतिशत तक कम कर देता है तथा लाभदायक वसा को बढ़ाने में सहायक होता है। कौंणी के बीजों में 9 प्रतिशत तक तेल की मात्रा भी पाई जाती है जिसकी वजह से विश्व के कई देशो में कौंणी से तेल का उत्पादन भी किया जाता है। FAO 1970 की रिपोर्ट तथा अन्य कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार कौंणी वसा, फाइवर, कार्बोहाईड्रेड के अलावा कुछ अमीनो अम्ल जैसे tryptophan 103 mg, lysine 233 mg, methionine 296 mg, phenylalanine 708 mg, thereonine 328 mg, valine 728 mg & leucine 1764 mg प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते हैं। इस पौष्टिकता के साथ-साथ कौंणी एक non-glutinous होने की वजह से आज विश्वभर में कई खाद्य उद्योगों में एक प्रमुख अवयव है। कई देशों में कौंणी का आटा पोष्टिक गुणवत्ता की वजह से इसको Bakery industry में बहुतायत में प्रयोग किया जाता है। कौंणी से निर्मित ब्रेड में प्रोटीन की मात्रा 11.49 की अपेक्षा 12.67, वसा 6.53 की अपेक्षाकृत कम 4.70 तथा कुल मिनरल्स 1.06 की अपेक्षाकृत अधिक 1.43 तक पाये जाते हैं। जबकि पौष्टिकता के साथ-साथ ब्रेड का कलर, स्वाद तथा hardness भी बेहतर पाई जाती हैं। वर्तमान में ब्रेड उद्योग विश्वभर में तेजी से उत्पादन कर रही है। विश्व में 27 लाख टन वार्षिक ब्रेड का उत्पादन किया जाता है। अगर कौंणी के आटे को ब्रेड उद्योग में उपयोग किया जाता है तो न केवल ब्रेड पोष्टिक गुणवत्ता में बेहतर होगी बल्कि इस under utilized फसल जो असिंचित भू-भाग में उत्पादन देने की क्षमता रखती है को बेहतर बाजार उपलब्ध हो जायेगा और समाप्ति की कगार पर पहुंच चुकी कौंणी को पुर्नजीवित कर जीविका उपार्जन हेतु आर्थिकी का स्रोत बन सकती है। चीन में कौंणी से ब्रेड, नूडल्स, चिप्स तथा बेबी फूड बहुतायत उपयोग के साथ-साथ बीयर, एल्कोहल तथा सिरका बनाने में भी प्रयुक्त किया जाता है। कौंणी के अंकुरित बीज चीन में सब्जी के रूप में बडे़ चाव के साथ खाये जाते हैं। यूरोप तथा अमेरिका में कौंणी को मुख्यतः poultry feed के रूप में उपयोग किया जाता है। चीन, अमेरिका एवं यूरोप में कौंणी को पशुचारे के रूप में भी बहुतायत में प्रयोग किया जाता है। वर्ष 1990 तक विश्वभर में कौंणी का 5 मिलयन टन उत्पादन किया जाता था जो कि कुल millet उत्पादन का 18 प्रतिशत योगदान रखता है। विश्वभर में चीन कौंणी उत्पादन में प्रमुख स्थान रखता है जबकि अफ्रीका में अन्य millet की तुलना में कौंणी का उत्पादन कम पाया जाता है। असिंचित दशा में कौंणी का लगभग 800-900 किग्रा/हे0 तक उत्पादन लिया जा सकता है जिसमें पशुचारे हेतु लगभग 2500 किग्रा/हे0 भूसा भी उपलब्ध हो जाता है। चीन में कुछ बेहतर प्रजातियों से 1800 किग्रा/हे0 तक उत्पादन तक लिया जाता है। कौंणी को विश्व बाजार में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा 40 से 90 रूपये प्रति किलोग्राम तक बेचा जा रहा है। भारत तथा उत्तराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कौंणी पौष्टिकता के साथ-साथ सूखा सहन करने की अदभुत क्षमता होती है। उत्तराखण्ड जहां अधिकतम भू-भाग असिंचित होने की वजह से millet उत्पादन के लिये उपयुक्त है, कौंणी को उच्च गुणवत्तायुक्त वैज्ञानिक तकनीकी से उत्पादित किया जाय तथा केवल पशु आहार, कुकुट आहार, बेबी फूड के लिये भी किया जाय तो यह millet उत्पादकों के लिये सुलभ बाजार तथा आर्थिकी का प्रमुख साधन बन सकता है।
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