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American Grape

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Amla Juice (आंवले का जूस)

250.00 240.00
आंवला फल आइरन और विटामिन सी से भरपूर रस से भरा हुआ प्राकृ्तिक खजाना है. आंवले का जूस रोजाना लेने से पाचन दुरुस्त, त्वचा में चमक, त्वचा के रोगों में लाभ, बालों की चमक बढाने, बालों को सफेद होने से रोकने के अलावा और भी बहुत सारे फायदे हैं.
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Bhaang Ke Beej (भांग के बीज)

Hemp seeds can be eaten raw, ground into a meal, sprouted, or made into dried sprout powder. The leaves of the hemp plant can be consumed raw in salads. Hemp can also be made into a liquid and used for baking or for beverages such as hemp milk, hemp juice. Hempseed oil is cold-pressed from the seed and is high in unsaturated fatty acids.[ भांग के बीज भूरे और काले रंग के होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में इसके बीज से चटनी बनायी जाती है जिसे भांग और जीरे को अलग अलग भून कर इसका पेस्ट बनाकर इसमें आवश्यकतानुसार नमक,मिर्च और नीबू निचोड़कर सेवन किया जाता है।इसके बीजों की न्यूट्रीशीयस् वेल्यु बड़ी ही महत्वपूर्ण है इसमें 30% चर्बी जो लाइनोलिक एसिड ओमेगा -6 एवं ओमेगा -3 यानि अल्फ़ा -लाइनोलिक एसिड से युक्त होते हैं। इनमें गामा -लिनोलिक एसिड भी पाया जाता है जो अत्यंत पोषक होता है।भांग के बीज प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं लगभग 25% कुल केलोरी इन्ही प्रोटीन से प्राप्त होती है। भांग के बीज विटामिन-ई एवं मिनरल्स जैसे फास्फोरस,पोटेशियम,सोडियम, मैग्नीशियम,सल्फर,कैलसियम,लौह तत्व एवं ज़िंक के भी स्रोत हैं। चीन में भांग के बीजों से निकाले गए तेल का प्रयोग 3000 सालों से औषधि के रूप में होता रहा है। भांग के बीज हृदय रोगों की संभावना को कम कर देते हैं।इनमें उच्च मात्रा में आरगीनीन् एमिनो एसिड होता है जो शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड गैस बनाता है यह गैस खून की नालियों को फैलाने के साथ साथ तनावमुक्त रखती है जिससे ब्लड प्रेसर कम रहता है और हृदय रोग की संभावना कम हो जाती है। एक और बड़े अध्ययन जिसमें 13000 लोगों को शामिल किया गया से यह बात सामने आयी है कि आर्गिनीन प्रोटीन को लेने से शरीर में c-reactive protein का स्तर कम हो जाता है जिसे हृदय रोगों में इंफ्लेमेटरी मारकर कहा जाता है। कुछ और अध्ययन भी इस बात को साबित करते हैं कि भांग के बीज से प्राप्त तेल ब्लड प्रेशर को कम करने के साथ साथ खून के क्लॉट(थक्का) बनने की संभावना को भी कम कर देता है जिससे हृदयाघात के बाद भी हृदय शीघ्र स्वस्थ हो पाता है। भांग के बीजों में स्थित तेल मेंपाया जानेवाला फैटी एसिड त्वचा रोगों में लाभ देता है ।महिलाओं में मासिक धर्म से सम्बंधित समस्याओं में भांग के बीजों में मिलनेवाला गामा लाइनोलिक एसिड अत्यंत उपयोगी होता है जो प्रोस्टाग्लेंडिन ई 1 उत्पन्न करता है जो प्रोलेक्टिन के प्रभाव को कम कर देता है।इससे पोस्ट मीनोपौजल सिंड्रोम के लक्षणों में भी लाभ मिलता है।भांग के बीज पाचन प्रक्रिया को भी ठीक करते हैं।
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Buransh Juice (बुरांश जूस)

250.00 240.00
बुरांश सुन्दर फूलों वाला एक वृक्ष है। बुरांश का पेड़ उत्तराखंड का राज्य वृक्ष है, तथा नेपाल में बुरांश के फूल को राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया है। गर्मियों के दिनों में ऊंची पहाड़ियों पर खिलने वाले बुरांस के सूर्ख फूलों से पहाड़ियां भर जाती हैं। बुरांश के फूल का जूस हृदय रोग, किडनी, लिवर के अलावा रक्त कोशिकाओं को बढ़ाने और हड्डियों को सामान्य दर्द के लिए बहुत लाभदायी होता है।
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Fresh Salad

40.00
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Gahat Dal (गहत दाल)

200.00 190.00
Macrotyloma uniflorum (horse gram, kulthi bean, hurali, Madras gram) is one of the lesser known beans. The horse gram is normally used to feed horses, though it is also commonly used in cooking. In traditional Ayurvedic cuisine, horse gram is considered a food with medicinal qualities. It is prescribed for persons suffering from jaundice or water retention and as part of a weight loss diet. पहाड़ में सर्द मौसम में गहत की दाल लजीज मानी जाती है। प्रोटीन तत्व की अधिकता से यह दाल शरीर को ऊर्जा देती है, साथ ही पथरी के उपचार की औषधि भी है। यूं तो गहत आमतौर पर एक दाल मात्र है, जो पहाड़ की दालों में अपनी विशेष तासीर के कारण खास स्थान रखती है| यह दाल गुर्दे के रोगियों के लिए अचूक दवा मानी जाती है। आज हम फिर बात कर रहे हैं उत्तराखंड के एक ऐसे बहुमूल्य उत्पाद की जिसका नाम सुनते ही हमें इससे अपना परम्परागत सम्बन्ध याद आने लगता है। गहत उत्तराखण्ड में उगायी जाने वाली एक महत्वपूर्ण फसल है जिसका वैज्ञानिक नाम Macrotyloma uniflorum L. जो कि Fabaceae कुल का पौधा है। इसे ही Dolichos uniflorum भी कहते हैं। वैसे तो गहत का मुख्य स्रोत अफ्रीका माना जाता है लेकिन भारत में इसका इतिहास बहुत पुराना है। विश्व में पाए जाने वाली कुल 240 प्रजातियों में से 23 प्रजातियां सिर्फ भारत में पायी जाती हैं जबकि शेष प्रजातियां अफ्रीका में पायी जाती हैं। गहत को इसके अलावा और भी बहुत नामों से जाना जाता है जैसे कि अंग्रेजी में Horse gram, हिन्दी में कुलध, तेलुगू में उलावालु, कन्नड़ में हुरूली, तमिल में कोलू, संस्कृत में कुलत्थिका, गुजराती में कुल्थी तथा मराठी में डुल्गा आदि। भारत के अलावा चीन, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा इंडोनेशिया में भी गहत का उत्पादन किया जाता है। मुख्य रूप से भारत में गहत का उत्पादन लगभग सभी राज्यों में किया जाता है लेकिन कुछ प्रमुख राज्यों से भारत के कुल उत्पादन में 28 प्रतिशत कर्नाटक, 18 प्रतिशत तमिलनाडु, 10 प्रतिशत महाराष्ट्र, 10 प्रतिशत ओडिशा तथा 10 प्रतिशत आंध्र प्रदेश का योगदान है। भारत में गहत मुख्यतः रूप से असिंचित दशा में उगाया जाता है और जहां तक उत्तराखण्ड में गहत उत्पादन है यह परम्परागत दूरस्थ खेतो में उगाया जाता है क्योंकि गहत की फसल में सूखा सहन करने की क्षमता होती है, साथ ही नाइट्रोजन फिक्ससेशन करने की भी क्षमता होती है। इसकी खेती के लिये 20 से 30 डिग्री सेल्शियस, जहाँ 200 से 700 मिलीमीटर वर्षा होती है, उपयुक्त पायी जाती है। गहत बीज का उत्पादन भारत में 150 से 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर किया जाता था, मगर आई0सी0आर0आई0एस0ए0टी0, हैदराबाद द्वारा वर्ष 2005 में उच्च गुणवत्ता वाली प्रजाति विकसित की गयी जिससे गहत बीज उत्पादन बढ़कर 1100 से 2000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया है। गहत की मुख्यतः 02 प्रजातियां पायी जाती हैं जिनमें से कि एक जंगली तथा दूसरी खेती कर उगायी जाती हैं। यहां सामान्यतः गहत के बीज लाल, सफेद, काला तथा भूरा रंग के पाये जाते हैं। गहत को सामान्यतः दाल के रूप में प्रयोग किया जाता है जो कि गरीबों के भोजन में शामिल किया गया है। गहत में प्रोटीन तथा कार्बोहाईड्रेड की प्रचूर मात्रा होने के कारण आज गहत का उपयोग सम्पूर्ण विश्व में विभिन्न खाद्य तथा पोषक पदार्थों के रूप में किया जा रहा है। इसके बीज में कार्बोहाईड्रेड 57.3 ग्राम, प्रोटीन 22.0 ग्राम, फाइबर 5.3 ग्राम, कैरोटीन 11.9 आई0यू0, आयरन 7.6 मिलीग्राम, कैल्शियम 0.28 मिलीग्राम, मैग्नीशियम 0.18 मिलीग्राम, मैग्नीज 37.0 मिलीग्राम, फोस्फोरस 0.39 मिलीग्राम, कॉपर 19.0 मिलीग्राम तथा जिंक 0.28 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते हैं। परम्परागत रूप से ही गहत का उपयोग इसकी विशेषताओ के अनुरूप किया जाता है। इसकी प्रकृति गरम माने जाने के कारण इसका मुख्य उपयोग सर्दियों में या अधिक ठंड होने पर अधिक किया जाता है। दास, 1988 तथा पेसीन, 1999 द्वारा अपने शोध में गहत को कैल्शियम तथा कैल्शियम फास्फेट स्टोन को गलाने तथा बनने से रोकने के लिये पाया गया। एक आयुर्वेदिक औषधि सिस्टोन में भी गहत को मुख्य भाग में लिया जाता है जो कि किडनी स्टोन के लिये प्रयोग की जाती है। इसके अलावा अन्य विभिन्न शोधों में भी इसके उपयोग को किडनी रोगो के रूप में उपयुक्त पाया गया है। इसमें फाइटिक एसिड तथा फिनोलिक एसिड की अच्छी मात्रा होने के कारण इसे सामान्य कफ, गले में इन्फेक्शन , बुखार तथा अस्थमा आदि में प्रयोग किया जाता है। भारतीय कैमिकल टैक्नोलॉजी संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किये गये एक शोध में बताया गया है कि गहत के बीज में प्रोटीन टायरोसिन फॉस्फेटेज 1-बीटा एन्जाइम को रोकने की क्षमता होती है जो कि कार्बोहाईड्रेड के पाचन को कम कर शुगर को घटाने में मदद करता है तथा साथ ही शरीर में इन्सुलिन रेजिसटेंस को भी कम करता है। उत्तराखण्ड में गहत को बाजार उपलब्ध न होने के कारण स्थानीय काश्तकार केवल स्थानीय विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत चावल, नमक एवं नगदी के बदले बेच देते हैं जबकि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर में गहत 100 से 200 रूपये प्रति किलोग्राम तक बेचा जाता है। उत्तराखण्ड गहत स्वयं में एक ब्रांड होने के कारण बड़े बाजारों में इसकी मांग रहती है जिसकी औषधीय तथा न्यूट्रास्यूटिकल महत्ता को देखते हुये आज विभिन्न कम्पनियां नये-नये शोध कर उत्पाद बना रही है तथा भविष्य में इसकी बढ़ती मांग हेतु इसके बहुतायत उत्पादन की आवश्यकता है। राज्य के परिप्रेक्ष्य में गहत की खेती यदि वैज्ञानिक एवं व्यवसायिक रूप में की जाय तथा दूरस्थ खेतो में जो कि बंजर होते जा रहे है में भी की जाये तो यह राज्य की आर्थिकी का एक बेहतर प्रायः बन सकता है।
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Germany Tomatoes

60.00
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Green Cauliflower

35.00
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Harshil Rajma

Just Organik Harshil Rajma is grown and harvested above 2200 Meter height in Harshil valley in a very pleasant high Himalayan atmosphere-across Gangotri National Park.The organic quality Harshil Rajma absorbs water very quickly therefore easily soaked and dissolved in water.Takes at least 1/3rd less time for cooking so it is boiled & cooked very easily.It has a strong flavour with slightly sweet aftertaste. The tasteful thick gravy with robust flavour makes it a welcome addition to salads, soups and rice dishes. The important characteristics of these beans are highly fibrous, anti-acidic & easily digestible, hence as a result people experience a pleasant Zero flatulence feeling .The dietary fiber present in these beans helps in lowering blood cholesterol levels in the body. Famous Himalayan Harshil Rajma(Kidney beans) from Gangotri Valley of Uttarakhand.A famous pulse being grown in completely non polluted and chemical free environment of place called Harshil or Harsil in Uttarakhand. Harshil Rajma is a very good source of cholesterol lowering fibers and virtually fat free quality protein. its fiber content prevents blood sugar level from rising rapidly after meal.Grown organically in the Gangotri Valley of Uttarakhand, Harshil Rajma has a distinct aroma and flavour, and takes very less time to cook. It is generally served with steamed rice or roti,which makes it an ideal staple for everyday consumption and is a popular pahadi delicacy in the hills of Kumaon and Garhwal region of the Himalayan state. One of the most popular vegetarian delicacies of North India, the organic Harshil Rajma from the pristine Himalayan valleys is sure to satiate your taste buds. Whip it up with onion, tomatoes and Indian spices and garnish it with coriander leaves for a truly unforgettable meal. Brownish white in colour, the taste of Harshil Rajma is completely unique.
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Hisalu (हिसालू)

100.00 90.00

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Rubus Ellipticus (Hisalu), commonly known as golden Himalayan raspberry or as yellow Himalayan raspberry, is an Asian species of thorny fruiting shrub in the rose family. Hisalu is wild fruit berry which has yellow color and sweet taste. Prior Hisalu mature in the period of May and June yet because of climatic change the aging period of Hisalu changed into March to April, so the availability of this fruits are in starting of summer season. It is not harvested for domestic use and mostly found in forests. Hisalu perishes quickly after plucking from the thorny bush. Tourists can purchase Hisalu from the road side local sellers or order online from our website. हिसालू वनस्पति जो खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है अपने अद्भुत गुणों के लिए विख्यात है| इसका लेटिन नाम Rubus Ellipticus है जो Rosaceae कुल की झाडीनुमा वनस्पति है और इसे "हिमालयन-रसबेरी" के नाम से भी जाना जाता है| आइये जानते है हिसालू खाने के फायदे:-
  • इसमें एंटीआक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाया जाता है|
  • इसकी ताजी जड़ से प्राप्त रस का प्रयोग पेट से सम्बंधित बीमारियों में लाभकारी होता है|
  • इसकी जड़ों को बिच्छुघास (Indian Stinging Nettle) की जड़ एवं जरुल (Lagerstroemia Parviflora) की छाल के साथ कूट कर काढा बनाकर बुखार को दूर करने में प्रयोग किया जाता है|
  • इसके फलों से प्राप्त रस का प्रयोग बुखार, पेट दर्द, खांसी एवं गले के दर्द में बड़ा ही फायदेमंद होता है|
  • इसकी पत्तियों की ताज़ी कोपलों को ब्राह्मी की पत्तियों एवं दूर्वा (Cynodon Dactylon) के साथ मिलाकर रस निकालकर पेप्टिक अल्सर की चिकित्सा में भी उपयोग किया जाता है|
  • इसकी छाल का प्रयोग तिब्बती चिकित्सा पद्धति में भी सुगन्धित एवं कामोत्तेजक प्रभाव के लिए किया जाता है|
  • इस वनस्पति का प्रयोग किडनी-टोनिक के रूप में भी किया जाता है साथ ही साथ नाडी-दौर्बल्य, अत्यधिक मूत्र आना (पोली-यूरिया), योनि-स्राव, शुक्र-क्षय एवं शय्या-मूत्र(बच्चों द्वारा बिस्तर गीला करना) आदि की चिकित्सा में भी किया जाता है|
  • इसके फलों से प्राप्त एक्सट्रेक्ट में एंटी-डायबेटिक प्रभाव भी देखे गए हैं|
** हिसालू जैसी वनस्पति को सरंक्षित किये जाने की आवश्यकता को देखते हुए इसे आई.यू.सी.एन. द्वारा वर्ल्ड्स हंड्रेड वर्स्ट इनवेसिव स्पेसीज की लिस्ट में शामिल किया गया है|**

साभार: डॉ. नवीन चंद्र जोशी

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Indian Potatoes

70.00 65.00
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Jakhya (जख्या)

Himalayan Jakhya (Cleome viscose) or Jakhia from Uttarakhand is a crunchy pahadi herb ingrediant to most uttrakhandi dishes and is used for tempering all types of pahadi cuisines.So no Pahadi dish is complete without adding it. The Jakhia seeds are small, dark brown or black.Due to its nutty aroma,it adds unique and crunchy flavour to any dish. This relatively unknown spice is an essential component of some of the most delectable cuisines from Garhwal. Jakhya is a spice which is hard to find in your local supermarket or grocery store. Our fresh Jakhya has been sourced from the high alpine forests of the Himalayas where it is cultivated in a totally organic way. Jakhya helps to spice up your vegetables and can also be used as a substitute for jeera. जख्या अपने अदभुत स्वाद के लिये पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध है जिसकी उत्तराखण्ड में व्यवसायिक खेती तो नहीं वरन घरेलू उपयोग के लिये उगाया जाता है या स्वतः ही उग जाता है। उत्तराखण्ड में शायद ही कोई ऐसा भोजन होगा जिसमें जख्या का उपयोग तड़के में न किया जाता हो, इसका स्वाद अपने आप में अनोखा है। आज उत्तराखण्ड में ही नहीं अपितु बड़े शहरों के होटलों में भी जख्या का प्रयोग तड़के के रूप में किया जाता है तथा उत्तराखण्ड के प्रवासी भी विदेशों में जख्या यहीं से ले जाते हैं ताकि विदेशों में भी पहाड़ी जख्या का स्वाद ले सकें। Cleome जीनस के अन्तर्गत लगभग विश्वभर में 200 से अधिक प्रजातियां उपलब्ध है। जख्या निम्न से मध्य ऊंचाई तक उगने वाला पौधा है। यह मूल रूप से अफ्रीका तथा सऊदी अरब से सम्बन्धित माना जाता है। वैज्ञानिक रूप से जख्या capparidaceae परिवार से सम्बन्ध रखता है। जख्या शायद ही कहीं पर, मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता होगा, वस्तुतः यह एक खरपतवार की तरह ही जाना जाता है व मुख्य फसल के साथ बीच में ही उग जाता है। सम्पूर्ण एशिया व अन्य कई देशों में जख्या को खरपतवार के रूप में ही पहचाना जाता है जबकि प्राचीन समय से ही यह पारम्परिक मसालें का मुख्य अवयव है। जख्या का महत्व केवल इसके बीज से ही है जिसको मसालें के रूप में प्रयोग किया जाता है। एशिया तथा अफ्रीका में इसकी पत्तियों को पारम्परिक रूप से बुखार, सिरदर्द, गठिया तथा संक्रमण के निवारण के लिये भी प्रयुक्त किया जाता है। जबकि विश्व के कई अन्य देशों में सम्पूर्ण पौधे को कानदर्द, घाव भरने तथा अल्सर के लिये प्रयुक्त किया जाता है। आज भी पारम्परिक रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में जख्या के बीज का रस मानसिक बीमारियों के निवारण के लिये प्रयोग किया जाता है। जख्या का महत्व इसी गुणों से समझा जा सकता है कि इसमें anti-helminthic, analgesic, antipyretic, anti-diarrhoeal, hepatoprotective तथा allelopathic गुणों से भरपूर होने के साथ-साथ antiseptic, carminative, cardiac तथा digestive stimulant गुण भी पाये जाते हैं। जख्या में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें cleomiscoinas, coumarina-lignoids, clcosandrin तथा flavouring agent पाए जाते हैं, जिसकी वजह से इसका स्वाद विश्व प्रसिद्ध है इसके बीज में 18.3 प्रतिशत तेल जो कि फैटी एसिड, अमीनो अम्ल से भरपूर होता है, भी लाभकारी पाया जाता है क्योंकि इसमें analgesic गुणों के साथ-साथ ओमेगा-3 तथा ओमेगा-6 महत्वपूर्ण अवयव पाये जाते हैं। जहां तक जख्या के पोष्टिक गुणों की बात की जाय तो इसमें फाईबर 7.6 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट 53.18 प्रतिशत, स्टार्च 3.8 मि0ग्रा0, प्रोटीन 28 प्रतिशत, वसा 0.5 प्रतिशत, विटामिन सी 0.215 मि0ग्रा0, विटामिन इ 0.0318 मि0ग्रा0, कैल्शियम 1614.2 मि0ग्रा0, मैग्नीशियम 1434.3 मि0ग्रा0, पोटेशियम 145.25 मि0ग्रा0, सोडियम 59.85 मि0ग्रा0, लौह 30.10 मि0ग्रा0, मैग्नीज 7.70 मि0ग्रा0, जिंक 1.995 मि0ग्रा0 तक पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त जख्या के बीज में coumarinolignoids रासायनिक अवयव का स्रोत होने से भी फार्मास्यूटिकल उद्योग में लीवर सम्बन्धी बीमारियों के निवारण के लिये अधिक मांग रहती है। वर्ष 2012 में प्रकाशित इण्डियन जनरल ऑफ एक्सपरीमेंटल बायोलॉजी के एक शोध पत्र के अध्ययन के अनुसार जख्या के तेल में जैट्रोफा की तरह ही गुणधर्म, विस्कोसिटी, घनत्व होने के वजह से ही भविष्य में बायोडीजल उत्पादन के लिये परिकल्पना की जा रही है। सम्पूर्ण पौधे के औषधीय गुणों के साथ-साथ जख्या का बीज मुख्यतः मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है जो cumin का बेहतर विकल्प भी माना जाता है। 80 एवं 90 के दशकों तक जख्या को केवल स्थानीय काश्तकारों द्वारा स्वयं के उपयोग के लिये ही उगाया जाता था परन्तु वर्तमान में राष्ट्रीय तथा अंतराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा इसके पोष्टिक एवं स्वाद के अद्भुत गुणों के कारण वृहद मांग रहती है। परन्तु कम मात्रा में इसका उत्पादन होने के कारण इसको नकदी फसल का स्थान नहीं मिल पाया है क्योंकि उत्तराखण्ड में स्वयं के उपयोग के लिये ही उगाया जाता है जबकि एक अध्ययन के अनुसार यदि जख्या को मुख्य फसल के रूप में अपनाया जाय तो यह तीन गुना उत्पादन देने की क्षमता रखती है। यह एक अत्यन्त विचारणीय विषय है कि पोष्टिक एवं औषधीय रूप से इतने महत्वपूर्ण जख्या को खरपतवार के रूप में पहचाना जाता है जबकि उत्तराखण्ड के ही स्थानीय फुटकर बाजार में इसकी कीमत 200 रूपये प्रति किलोग्राम तक है तथा सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इसमें खरपतवार के रूप में विपरीत वातावरण, असिंचित व बंजर भूमि तथा दूरस्थ खेतों में भी उगने की क्षमता होती है। यदि जख्या को कम उपजाऊ भूमि तथा दूरस्थ खेतों में भी उगाया जाय तो यह बेहतर उत्पादन के साथ-साथ आर्थिकी का जरिया भी बन सकती है। पहाड़ी जख्या को खरपतवार ही नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण फसल भी बन सकती है।
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Japanese Strawberry

60.00
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Jhangora (झंगोरा)

250.00 225.00

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Echinochloa frumentacea (झंगोरा) is a species of Echinochloa. This millet is widely grown as a cereal in India, Pakistan, and Nepal. Its wild ancestor is the tropical grass Echinochloa colona, but the exact date or region of domestication is uncertain. It is cultivated on marginal lands where rice and other crops will not grow well. The grains are cooked in water, like rice, or boiled with milk and sugar. Sometimes it is fermented to make beer. While also being part of staple diet for some communities in India. उत्तराखण्ड में झंगोरा की खेती बहुतायत मात्रा में असिंचित भू-भाग में की जाती है। यह पोएसी परिवार का पौंधा है। उत्तराखण्ड में झंगोरा को अनाज तथा पशुचारे दोनों के लिये उपयोग किया जाता है। झंगोरा की महत्ता इसी बात से लगाई जा सकती है कि इसको बिलियन डालर ग्रास का नाम भी दिया गया है। विश्वभर में झंगोरा की 32 प्रजातियां पाई जाती है| आज विश्व में ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशो में अनाज आधारित उत्पाद बहुतायात मात्रा में बनाया जाता है। Foxtail Millet अन्य अनाज की अपेक्षा ज्यादा पोष्टिक, Gluten free तथा Slow digestible गुणों के कारण अन्य अनाजों के बजाय Millet का प्रयोग बहुतायत किया जा सकता है जो कि Foxtail Millet उत्पादकों के लिये बाजार तथा उत्पादो के लिये Gluten free food का बाजार बन सकता है। उत्तराखण्ड में ही नहीं भारत में भी खेती योग्य भूमि का अधिकतम भू-भाग असिंचित होने के कारण पौष्टिकता से भरपूर Millet उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है जो कि आर्थिकी का एक बडा विकल्प होगा। आइये जानते है झंगोरा खाने के फायदे:-
  • Foxtail Millet का सर्वाधिक उपयोग विश्व में केवल Alcohol निर्माण के लिये Poultry feed में ही किया जाता है।
  • झंगोरे में काबोहाइड्रेट के अलावा प्रोटीन -6.2 ग्राम, वसा-2.2 ग्राम, फाईवर-9.8 ग्राम, कैल्शियम -20 ग्राम, फास्फोरस 280 मि०ग्राम, आयरन- 5.0 मि0ग्राम, मैग्नीशियम- 82 मि0ग्राम, जिंक 3 मि0ग्राम पाया जाता है। झंगोरे में प्रोटीन 12 प्रतिशत जो कि 81.13 प्रतिशत 58.56% है तथा कार्बोहाइड्रेट 58.56% जो 25.88% Slow digestible होता है।

साभार: डा0 राजेन्द्र डोभाल

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Kaale Bhatt (काले भट्ट)

150.00 140.00
The black turtle bean is a small, shiny variety of the common bean. The black turtle bean has a dense, meaty texture, which makes it popular in vegetarian dishes छोटे-छोटे काले, चिकने से दिखने वाले भट्ट भारत में ही नहीं, अमेरिका में भी आम तौर पर खाए जाते हैं। ये एंटी-ऑक्सीडेंट्स का अच्छा स्रोत होते हैं। महज एक कप काले बीन्स के सेवन से 90 प्रतिशत तक फोलेट प्राप्त किया जा सकता है। भट्ट में 109 कैलोरी, 20 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 8 ग्राम फाइबर पाया जाता है। 100 ग्राम काली बीन्स में 1500 मिलीग्राम पोटैशियम, 9 मिलीग्राम सोडियम और 21 ग्राम प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। साथ ही इसमें मौजूद विटामिन ए, बी12, डी और कैल्शियम भी स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। बीन्स में फैट की मात्रा तो कम होती ही है, साथ ही इससे शरीर के लिए आवश्यक ओमेगा-3 और ओमेगा-6 की पूर्ति भी होती है। फायदे भट्ट कोलेस्ट्रॉल कम करने वाले फाइबर का अच्छा स्रोत है। थायामीन(विटामिन बी1), फॉस्फोरस, आयरन, कॉपर, मैग्नीशियम और पोटैशियम की भी अच्छा स्रोत है। वसा की मात्रा बहुत कम होती है, लेकिन साथ ही इसमें गैस बनाने वाले एंजाइम्स भी होते हैं, इसलिए हमेशा इसे पकाने से पहले कुछ देर के लिए भिगोकर रखना चाहिए। कोलेस्ट्रॉल कम करने के साथ ही इसमें मौजूद फाइबर ब्लड में ग्लूकोज की मात्रा को तेजी से बढ़ने से रोकता है, जो इन दालों को डायबिटीज, इंसुलिन रेसिसटेंट या हाईपोग्लाईसिमिया से जूझ रहे रोगियों के लिए उपयुक्त बनाता है। गर्भवती महिलाओं के लिए काले बीन्स में मौजूद फोलेट बच्चे के विकास में बहुत फायदेमंद होते हैं। बीन्स के उपयोग से आपकी वेस्टलाइन के बढ़ने की संभावना 23 फीसदी कम हो जाती है
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